गढ़वा/ केतार| विजयादशमी (दशहरा) के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन और प्रणाम की परंपरा आज भी जीवित है। गुरुवार की सुबह ग्रामीण आकाश की ओर नज़रें टिकाए रहे। जैसे ही नीलकंठ पक्षी उड़ता दिखाई दिया, लोगों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और सुख-समृद्धि की कामना की। मान्यता है कि दशहरा पर नीलकंठ दर्शन से जीवन में विजय और सौभाग्य मिलता है। भगवान शिव को भी नीलकंठ कहा जाता है, इसलिए इसे शिव का प्रतीक माना जाता है। वहीं रामायण की कथा के अनुसार, रावण पर विजय से पहले भगवान श्रीराम ने नीलकंठ का दर्शन किया था और इसे शुभ संकेत माना था। तभी से दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन की परंपरा जुड़ी। ग्रामीणों का कहना है कि “हर साल दशहरा के दिन नीलकंठ के दर्शन करना शुभ होता है। इससे परिवार में शांति और खुशहाली आती है।” किसानों का मानना है कि नीलकंठ दर्शन को अच्छी फसल और समृद्धि का संकेत माना जाता है|



