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प्राचीन मां काली मंदिर की अद्वितीय प्रतिमा, रहस्यों और आस्थाओं से जुड़ी कथा

प्राचीन मां काली मंदिर की अद्वितीय प्रतिमा, रहस्यों और आस्थाओं से जुड़ी कथा

विंढमगंज (सोनभद्र)।
सदियों पुराना मां काली मंदिर आज भी आस्था और रहस्यों का केंद्र बना हुआ है। पुराने व्यक्तियों के कथन अनुसार, अंग्रेजी हुकूमत के जमाने में ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन कलेक्टर विंढ़म द्वारा निर्मित पोखरे के किनारे आदिवासी समाज ने मां काली की प्रतिमा स्थापित की थी। तभी से इस मंदिर की महत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली गई।

मां काली की प्रतिमा आज भी रहस्य बनी हुई है। कोई इसे ग्रेनाइट से निर्मित मानता है, तो कोई इसे किसी और अज्ञात पदार्थ का मानता है। किंतु आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि प्रतिमा किस पदार्थ से बनी है और यह कितनी प्राचीन है।

ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है और इसकी महिमा लगातार अनुभव की जाती रही है। प्राचीन काल में यहां बलि प्रथा प्रचलित थी। आदिवासी समाज यह मानता था कि बलि देने से माता प्रसन्न होती हैं।

लेकिन सन 1900 ईस्वी के आसपास पुजारी स्वर्गीय श्री राम प्रसाद तिवारी ने बलि प्रथा का विरोध किया। उनका मानना था कि किसी भी जीव की बलि नहीं दी जानी चाहिए। इसके बाद से मंदिर में नारियल और प्रसाद चढ़ाकर माता की पूजा की जाने लगी। तब से लेकर आज तक यही परंपरा निरंतर चल रही है।

मां काली मंदिर में दोनों नवरात्रि पर्व पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से माता का पूजन करता है और मनोरथ मांगता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

यह प्राचीन मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र और लोककथाओं का जीवंत उदाहरण है।

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